हनुमान नही पर राम भक्त हैं
राम हमारे रोम रोम हैं ।
सच (!) कहते हैं कुछ विद्वान (?)
राम नही इतिहास में हैं !
हां, राम इतिहास नही हो सकते !
वो तो सदा बर्तमान रहे हैं ।
भूत में भी विद्यमान रहे हैं
हर इंसां के दिल में रहे हैं ।
बर्तमान में भी उनका अस्तित्व
छाप अमिट आदर्श व्यक्तित्व ।
भविष्य में भी हर पल रहेंगे
हर जीवन के पूज्य रहेंगे ।
अयोध्या, लंका, पंचवटी,
मिथिला,किषकिंधा, जनकपुर,
शबरी, अत्रि, मार्कण्डेय आश्रम,
धनुषकोटि, चित्रकूट, रामेश्वर ।
पग - पग पर मिलते राम पग
फिर भी कहते राम नही हैं ।
देख उठा कर भारत भू की
मुट्ठी भर मिट्टी यहां की ।
कण - कण में तुम्हे राम मिलेंगे;
फिर भी दिखें न राम तुम्हें तो,
आकर सीना चीर के देखो -
हर दिल में तुम्हें राम दिखेंगे ।
राम - राम जप तर गये कितने
राम बसा मन पाया स्वर्ग ।
राम रमा है अखिल जगत में
मोक्ष बस राम नाम संसर्ग ।
राम - सेतु धरोहर अपनी
क्यों न करें हम पुनरुद्धार ।
नवजीवन दे राम सेतु को
कर लें अपना भी उद्धार ।
कवि कुलवंत सिंह
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Sunday, November 18, 2007
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