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Thursday, May 24, 2007

दर्पण देख लिया होता

न कदर की तूने मेरी
कोई बात नही,
मेरे प्यार को आजमा के
देख लिया होता!
.
मेरे प्यार के आमंत्रण को
हंसी मे तुने उड़ाया,
न जाना था, ’प्यार क्या है?’
हमसे पूछ लिया होता!
.
कभी आँखों मे झाँककर
देख लिया होता,
या दिल मे उतर कर
महसूस किया होता!
.
धड़कनों से मेरी
तूने पूछ लिया होता,
या दर्पण में खुद को
कभी देख लिया होता!
.
कवि कुलवंत सिंह