नहीं है सांझ अपनी औ सवेरा ।
न आया रास मुझको शहर तेरा ॥
वहां पूरा मुहल्ला घर था अपना,
यहां इक रूम का कोना है मेरा ।
वहाँ कस्बे में था आंगन लगा घर,
यहाँ सूरज न ही है चांद मेरा ।
यहाँ बसते हैं लगता चील कौवे,
हमेशा नोंचते हैं मांस मेरा ।
हुई है खत्म लगता जात आदम,
बना हर घर यहाँ भूतों का डेरा ।
जिधर देखो उधर हैवान दिखते,
कहाँ खोजूँ मैं इंसां का बसेरा ।
गुजारा हो नहीं सकता यहां पर,
मुझे लगता नही यह शहर मेरा ।
कवि कुलवंत सिंह
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Thursday, November 20, 2008
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