Showing posts with label ग़ज़ल - नहीं है सांझ. Show all posts
Showing posts with label ग़ज़ल - नहीं है सांझ. Show all posts

Thursday, November 20, 2008

ग़ज़ल - नहीं है सांझ

नहीं है सांझ अपनी औ सवेरा ।
न आया रास मुझको शहर तेरा ॥

वहां पूरा मुहल्ला घर था अपना,
यहां इक रूम का कोना है मेरा ।

वहाँ कस्बे में था आंगन लगा घर,
यहाँ सूरज न ही है चांद मेरा ।

यहाँ बसते हैं लगता चील कौवे,
हमेशा नोंचते हैं मांस मेरा ।

हुई है खत्म लगता जात आदम,
बना हर घर यहाँ भूतों का डेरा ।

जिधर देखो उधर हैवान दिखते,
कहाँ खोजूँ मैं इंसां का बसेरा ।

गुजारा हो नहीं सकता यहां पर,
मुझे लगता नही यह शहर मेरा ।

कवि कुलवंत सिंह