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Tuesday, August 25, 2009

ब्रजेश पाठक मौन - की स्मृति में रचा गया गीत

ब्रजेश पाठक मौन

मौन की वाणी मधुर
था मौन का हंसना मधुर,
मौन का चिंतन प्रखर
थे मौन के मुखरित अधर ?

शून्य में है वह तिरोहित
मुक्ति ले जन्मों का बंधन,
याद रखना यादें संजो
अब नही करना है क्रंदन .

नीर न नयनों में लाना
स्मृतियों को चंदन बनाना,
स्मृति पटल पर ओस कण सी
तात की यादें सजाना .

सर से जब उठ जाता हाथ
रास नही कुछ आता है,
वही है दुनिया, लोग वही हैं
मन बस बेबस हो जाता है .

हर धड़कन बन कर अब स्पंदन
गीत तुम्हारे गाता है,
सुरभि सुमन स्मृति बिखरा कर
चारों धाम यहां पाता है .

प्रेम रस का अर्ध्य चढ़ाकर
काव्य की धारा बहा दी,
भावों का संसार लेकर
सौरभ श्रद्धा माला चढ़ा दी .

परिमल बसी तुलसी का आंगन
ज्योत दीप में जलती पावन,
घर के इक - इक कोने में है
सुरभित यादों का सावन .

पारंगत कई विधाओं में
आकृतियों के नवरूपों में,
चित्रकला की पद्धतियों में
वार्ता, सृजन, कलाओं में .

भाव-भंगिमा, नव अभिव्यंजन
अलंकार, छंद कवि का गुंजन,
आंखे भर - भर आती हैं
गीत सृजन, नव गीत सृजन .

अवसादों ने किया न निर्बल
झंझाओं से हुआ न दुर्बल,
आत्म मुग्ध अभिमंत्रित तन था
करूणा से आप्लावित निर्मल .

मंथर मंजुल मधु स्मृतियां
निर्झर बन कर बहती हैं,
राजेश प्रियंका औ नीलेश के
रोम रोम में रहती हैं .

कवि कुलवंत सिंह