नील कण्ठ तो मै नही हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है !
कवि होने की पीड़ा सह लूँ
क्यों दुख से बेचैन धरा है ?
त्याग, शीलता, तप सेवा का
कदाचित रहा न किंचित मान ।
धन, लोलुपता, स्वार्थ, अहं का,
फैला साम्राज्य बन अभिमान ।
मानव मूल्य आहत पद तल,
आदर्श अग्नि चिता पर सज्जित ।
है सत्य उपेक्षित सिसक रहा,
अन्याय, असत्य, शिखा सुसज्जित ।
ले क्षत विक्षत मानवता को
कांधों पर अपने धरा है ।
नील कण्ठ तो मैं नही हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
सौंदर्य नही उमड़ता उर में,
विद्रूप स्वार्थ ही कर्म आधार ।
अतृप्त पिपासा धन अर्जन की,
डूबता रसातल निराधार ।
निचोड़ प्रकृति को पी रहा,
मानव मानव को लील रहा ।
है अंत कहीं इन कृत्यों का,
मानव! तूँ क्यों न संभल रहा ?
असहाय रुदन चीत्कारों को,
प्राणों में अपने धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
तृष्णा के निस्सीम व्योम में,
बन पिशाचर भटकता मानव ।
संताप, वेदना से ग्रसित,
हर पल दुख झेल रहा मानव ।
हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों ?
शिरोधार्य कर अटल सत्य को,
सीने में अंगार धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
कवि कुलवंत सिंह..
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Monday, March 3, 2008
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