Showing posts with label गज़ल - चुभा कांटा. Show all posts
Showing posts with label गज़ल - चुभा कांटा. Show all posts

Monday, October 15, 2007

गज़ल

पेशे खिदमत है एक गज़ल

चुभा कांटा चमन का फ़ूल माली ने जला डाला
बना हैवान पौधा खींच जड़ से ही सुखा डाला

चला मैं राह सच की हर बशर मेरा बना दुश्मन
जो रहता था सदा दिल में जहर उसने पिला डाला

बड़ी हसरत से उल्फ़त का दिया हमने जलाया था
उसे काफ़िर हवा ने एक झटके में बुझा डाला

सताया डर कि दौलत बँट न जाए पैसे वालों को
थे खुश हम खा के रूखी छीन उसको भी सता डाला

उजाड़े घर हैं कितने उसने पा ताकत को शैतां से
बसाने घर कुँवर का अपनी बेटी को गला डाला

कवि कुलवंत सिंह