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Thursday, May 31, 2007

अपनापन

(आज के युग में मानव की जिंदगी से अपनापन कहीं लुप्त होता जा रहा है। स्वार्थ एवं धन की होड़ में अपनापन छूटता जा रहा है। लेकिन यह कहीं दूर नही है, हमारे आसपास ही है। हम किस तरह इसे आसानी से पा सकते हैं - चंद पंक्तियों में देखिये -
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एक छोटी सी मुस्कुराहट भी
दिल जीत लेती है
मुस्कुरा कर तो देखो!
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वार्तालाप एक अजनबी को भी
अपना बना देती है
बात कर के तो देखो!
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बड़ा बन माफ़ करने से
दूरियां मिट जाती हैं
माफ़ कर के तो देखो!
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गिले शिकवे भुलाने से
प्यार ही पनपता है
गले लगा के तो देखो!
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कवि कुलवंत सिंह