ओ मेरे प्रीतम मनबसिया
तेरी याद सताए रंगरसिया
निखरी है चेहरे पर रंगत
कहां छुपा है रंगरलिया .
मिलन वह अपना पहला पहला
पलकों का उठ उठ गिरना
बेकाबू धड़कन का होना
मुझको निहारें तोरी अखियां .
दिल से दिल के जाम मिले
खामोशी से लब सिले
दो तन मिल इक प्राण हुए
प्यार में तोरे सद के जिया .
दिल पर कैसे काबू करूँ
तन्हा खुद से बातें करूँ
मौसम फिर है बहका बह्का
क्यूँ हो सताते आओ पिया .
फागुन के रंग बिखरे बिखरे
मदहोशी का बहता दरिया
लाज के मारे कुछ न बोलूँ
गले लगा ले ओ मन रसिया .
कवि कुलवंत सिंह
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Thursday, July 30, 2009
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