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Wednesday, August 12, 2009

गज़ल - प्यार भले कितना ही कर लो,

प्यार भले कितना ही कर लो, दिल में कौन बसाता है .
मीत बना कर जिसको देखो, उतना ही तड़पाता है .

मेरा दिल आवारा पागल, नगमें प्यार के गाता है
ठोकर कितनी ही खाई पर बाज नही यह आता है .

मतलब की है सारी दुनिया कौन किसे पहचाने रे
कौन करे अब किस पे भरोसा, हर कोई भरमाता है .

अपना दुख ही सबको लगता सबसे भारी दुनिया में
बस अपने ही दुख में डूबा अपना राग ही गाता है .

खून के रिश्तों पर भी देखो छाई पैसे की माया
देख के अपनो की खुशियों को हर चेहरा मुरझाता है .

कहते हैं अब सारी दुनिया सिमटी मुट्ठी में लेकिन
सात समंदर पार का सपना सपना ही रह जाता है .

इंसा नाच रहा हैवां बन, कलयुग की कैसी छाया
मैने जिसको अपना माना, मुझको विष वो पिलाता है .

आँख में मेरी आते आंसू, जब भी करता याद उसे
दूर नही वह मुझसे लेकिन, पास नही आ पाता है .

इक लम्हे के लिए भी जिसने, अपना दिल मुझको सौंपा
जीवन भर फिर याद से अपनी, मुझको क्यूँ वो रुलाता है .

मेरे पैरों में सर रख कर, दर्द की दी उसने दुहाई
दर्द की लेकर मुझसे दवाई मुझको आँख दिखाता है .

कवि कुलवंत सिंह