दीन दुनिया धर्म का अंतर मिटा दे
जोत इंसानी मोहब्बत की जला दे
ऐ खुदा बस इतना तूँ मुझ पर रहम कर
दिल में लोगों के मुझे थोड़ा बसा दे
उर में छायी है उदासी आज गहरी
मुझको इक कोरान की आयत सुना दे
जब भी झाँकू अपने अंदर तुमको पाऊँ
बाँट लूँ दुख दीन का जज़्बा जगा दे
रोशनी से तेरी दमके जग ये सारा
नूर में इसके नहा खुद को भुला दे
कवि कुलवंत सिंह
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Tuesday, December 4, 2007
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