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Monday, June 11, 2007

प्रियतम

रातभर सोई नही
सपनों में खोई रही,
निर्निमेष प्रियतम के
ख्यालों संग मै खोई रही।
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लावण्य मोहित रूप को
पल पल निरखती रही,
सरल, सहज, सलोने मीत
को अर्पित होती रही।
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मधु यौवन रस
मदिरा सा पिलाते रहे,
प्राण - हृदय मेरे
मुझे नींद से जगाते रहे।
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मनभावन प्रियतम
सपनों मे आते रहे,
पलकों से सौंदर्य मद
नयनों का पिलाते रहे।
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कपोलों की लालिमा
चुंबनों से चुराते रहे,
अधरों पर अरुणाई
अधरों से सजाते रहे।
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उद्वेलित यौवन भार
आलिंगन में बल खाते रहे,
पावन स्निग्ध मधुर प्यार
सारी रात छलकाते रहे।
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तन पर मेरे चाँदनी से
सोलह सिंगार करते रहे,
मनभावन प्रियतम
सपनों में आते रहे।
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कवि कुलवंत सिंह