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Friday, February 5, 2010

प्रस्तर मन

मानव मन बना है प्रस्तर

मानव क्या लेकर जाएगा,
मिटटी में खुद मिल जाएगा,

इस जग में फिर कैसे कैसे, ढ़ो रहा आडंबर .
मानव मन बना है प्रस्तर .

पैसा पापों का मूल बना,
हर रिश्ता लगता शूल बना,

अपने हाथ अपनों को मार, नाच रहा दिगंबर .
मानव मन बना है प्रस्तर .

छल, कपट, झूठ पहचान बनी,
सच बात लगे अब झूठ सनी,

लहू पीने को बेताब है, ले हाथ में खंजर .
मानव मन बना है प्रस्तर .

कवि कुलवंत सिंह