Sunday, March 9, 2008

प्रेम

इस काव्य रचना में मात्रिक छंदों के साथ लय बद्धता का ध्यान तो रखा ही गया है साथ ही दो नये प्रयोग भी किए गये हैं ।
एक - पूरी काव्य रचना सिर्फ दो अक्षरीय शब्दों के साथ की गई है ।
दूसरा - किसी भी शब्द की पुनरावृत्ति नही है ।

नायक (नायिका से) :

हम तुम हर पल संग धरा पर,
सुख दुख तम गम धूप छांव उर ।
तन मन प्रण कर प्रीत गीत ऋतु
छल, काल, जाल, विष पान हेतु ।

कोटि भाव नित, होंठ नव गान,
झूम यार मद, लग अंग प्रान ।
तरु लता बंध, भेद चिर मिटा,
काम, रस, प्रेम, बाण कुछ चला ।

भय भूल झूल, राग रति निभा,
रीत मधु मास, रास वह दिखा ।
छवि कांति देह, मुख जरा उठा,
ताल शत धार, आग वन लगा ।

* * * * *

नेपथ्य से :

नीर रंग भर, सात सुर सजा,
झरें फूल नभ, वाद्य युग बजा ।
जप-तप-व्रत, दीप रोली हार,
जगा जग रैन, नत ईश द्वार ।

शील सेवा रत, हरि हाथ सर,
प्यार रब संग, देव देवें वर ।
शूल, शैल, शर, बनें फूल खर
ढ़ाल खुद खुदा, खुशी अंक भर ।

तज राज यश, मिटा पाप ताप,
माया भ्रम क्षुधा, तोड़ डर शाप ।
ठान सत्य मूल, रोम रग धार
बल बुद्धि धूल, रूह नर सार ।

चूर दिन रात, भज राम नाम,
अश्रु आह मरु, शांति शिव धाम ।
बंधु, सखा सब, सुधि विधि छोड़,
लीन प्रभु ध्यान, लोभ निज मोड़ ।

दृग अंत: खोल, ज्ञान अति कोष,
आत्म निज नाद, सांई सच घोष ।
भुला प्रेम जन, सुत, मीत झूठ,
ओम एक सत, दिल बसा झूम ।

दृढ़ निज बोल, पर सेवा सोम
मेघ घन घोर, विभा सप्त व्योम ।
लिप्त गुरू पाद, रत्न जब भाव,
मोख मिले भक्त, पार मझ नाव ।

कवि कुलवंत सिंह

5 comments:

मीत said...

ओह हो. क्या बात है भाई !! कमाल. कमाल. बेहद उम्दा. बधाई स्वीकारें.

परमजीत बाली said...

बहुत अनोखा प्रयोग है।बहुत बढिया!!

महामंत्री (तस्लीम ) said...

मार्मिक भावनाएँ, खूबसुरत अभिव्यक्ति। बधाई।

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