Monday, March 3, 2008

नीलकण्ठ तो मै नही हूँ

नील कण्ठ तो मै नही हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है !
कवि होने की पीड़ा सह लूँ
क्यों दुख से बेचैन धरा है ?

त्याग, शीलता, तप सेवा का
कदाचित रहा न किंचित मान ।
धन, लोलुपता, स्वार्थ, अहं का,
फैला साम्राज्य बन अभिमान ।

मानव मूल्य आहत पद तल,
आदर्श अग्नि चिता पर सज्जित ।
है सत्य उपेक्षित सिसक रहा,
अन्याय, असत्य, शिखा सुसज्जित ।

ले क्षत विक्षत मानवता को
कांधों पर अपने धरा है ।
नील कण्ठ तो मैं नही हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।

सौंदर्य नही उमड़ता उर में,
विद्रूप स्वार्थ ही कर्म आधार ।
अतृप्त पिपासा धन अर्जन की,
डूबता रसातल निराधार ।

निचोड़ प्रकृति को पी रहा,
मानव मानव को लील रहा ।
है अंत कहीं इन कृत्यों का,
मानव! तूँ क्यों न संभल रहा ?

असहाय रुदन चीत्कारों को,
प्राणों में अपने धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।

तृष्णा के निस्सीम व्योम में,
बन पिशाचर भटकता मानव ।
संताप, वेदना से ग्रसित,
हर पल दुख झेल रहा मानव ।

हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों ?

शिरोधार्य कर अटल सत्य को,
सीने में अंगार धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।

कवि कुलवंत सिंह..

9 comments:

भोजवानी said...

कबीर सा रा रा रा रा रा रा रा रारारारारारारारा
जोगी जी रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा री

परमजीत बाली said...

कुलवं त जी,बहुत बेहतरीन रचना है।आप की हरेक रचना को पढ कर आनंद मिलता है।बहुत सुन्दर रचना है।सच्चाई ब्यां करती आप की ये पंक्तियां मन को छू गई-
निचोड़ प्रकृति को पी रहा,
मानव मानव को लील रहा ।
है अंत कहीं इन कृत्यों का,
मानव! तूँ क्यों न संभल रहा ?

नीरज गोस्वामी said...

कुलवंत जी
सुंदर भावपूर्ण कविता. शब्दों का चयन बहुत खूब.
"हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?"
आप की इन पंक्तियों से मिलते जुलते आशय का एक शेर मेरी नयी पोस्ट पर पढिये...जिसमें कहा है..
"सिर्फ़ सूली क्यों बनी सच के लिए
कोई पाया जान ये माया नहीं"
नीरज

मीत said...

कुलवंत भाई, बहुत ही उम्दा रचना. लेखनी भी उतनी हो सशक्त.

Udan Tashtari said...

सुन्दर रचना के लिये बधाई.

mehek said...

हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों ?
bahut hi sundar.

राज भाटिय़ा said...

आप की रचना बहुत ही सुन्दर हे, फ़िर आप के ब्लोग पर आते ही भगडा डालना शुरु कर दिया, कयो कि सगींत ही इतना अच्छा चला था

Kavi Kulwant said...

आप सभी प्रिय मित्रों का हार्दिक धन्यवाद...

रश्मि प्रभा said...

हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों ?
............
बहुत सही प्रश्न, पर रहेगा अनुत्तरित,क्योंकि आज भी होता है सत्य पराजित....