Monday, December 7, 2009

अमृत प्यार

अमृत प्यार

माँ के प्यार की महिमा का, करता हूँ गुणगान,
कभी कमी न प्यार में होती, कैसी है यह खान .
कष्ट जन्म का सहती है, फिर भी लुटाती जान,
सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान .

छाती से दूध पिलाती है, देती है वरदान,
पाकर आंचल की छांव, मिलता है सुख बड़ा महान.
इसके प्यार की महिमा का, कोई नही उपमान,
अपनी संतति को सुख देना ही इसका अरमान .

अंतस्तल में भरा हुआ है, ममता का भंडार,
संतानों पे खूब लुटाती, खत्म न होता प्यार .
ले बलाएं वह संतति की, दे खुशियों का संसार,
छू न पाए संतानों को, कष्टों का अंगार .

दुख संतति का आंख में बहता, बन कर अश्रुधार,
हर लेती वह पीड़ा सुत की, कैसा हो विकार .
संकट आएं कितने भारी, खुद पर ले हर बार,
भाग्य बड़े हैं जिनको मिलता, माँ का अमृत प्यार .

Kavi Kulwant Singh

6 comments:

रंजना said...

SACHMUCH MAA TO SHRISHTI KE POORNTA KA AADHAAR HAI......
IS SUNDAR RACHNA KE LIYE AAPKA AABHAR.

रंजना said...

SACHMUCH MAA TO SHRISHTI KE POORNTA KA AADHAAR HAI......
IS SUNDAR RACHNA KE LIYE AAPKA AABHAR.

योगेश स्वप्न said...

bahut sunder bhav purn matra stutu/rachna.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया जी!
चर्चा हिन्दी चिट्ठों की में भी इसकी चर्चा है जी!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

माँ को इस से प्यारी भेट नहीं हो सकती।

Ravi Rajbhar said...

Maan ka bahut hi sunder aur such vardan kiya hai aapne...jitna bhi kaha jye kam..kyon ki maan shabd hi yesa hai...!badhai