Sunday, October 18, 2009

गीत कौन सा मैं गाऊँ ?

जग ये जैसे रो रहा है
मातम घर घर हो रहा है .
गीत कौन सा मैं गाऊँ ?
कैसे दुनिया को बहलाऊँ ?

देने सुत को एक निवाला
बिक जाती राहों में बाला .
कौन धान की हांडी लाऊँ ?
भर भर पेट उन्हें खिलाऊँ ?

खेल अनय का हो रहा है
न्याय चक्षु बंद सो रहा है .
कौन प्रभाती राग सुनाऊँ ?
इस धरा पर न्याय जगाऊँ ?

दो कौड़ी बिकता ईमान
’क्यू’ में खड़ा हुआ इंसान .
कौन ज्योति का दीप जलाऊँ ?
मानस को अंतस दिखलाऊँ ?

सत्य सुबकता कोने में
झूठ दमकता पैसे में
कौन कोर्ट का निर्णय लाऊँ ?
झूठ सच का अंतर बतलाऊँ ?

कवि कुलवंत सिंह

11 comments:

M VERMA said...

सत्य सुबकता कोने में
झूठ दमकता पैसे में
बहुत भावमय और सामयिक रचना

महफूज़ अली said...

bahut hi achchi aur saarthak rachna.....


aapko deepawali ki haardik shubhkaamnayen....

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

बहुत ही भावपूर्ण बिंदास रचना . दिवाली शुभकामना के साथ.

परमजीत बाली said...

सामयिक व बढिया रचना है। आज कल यही देखने मे ज्यादा नजर आता है।

Udan Tashtari said...

बेहद भावपूर्ण रचना.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर रचना है यह तो।
भइया-दूज की शुभकामनाएँ!

Bahadur Patel said...

badhiya hai.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

गीत कौन सा गाऊँ? विचारप्रधान सरस गीत हेतु साधुवाद.

जब आशा से अधिक निराशा.
गुमी असत्य की ही परिभाषा.
गांधारी ने मूँदे नयना-
धृतराष्ट्रों से हुई हताशा.
तब आवश्यक दीप जलाऊँ.
सत-शिव-सुन्दर गाऊँ..

योगेश स्वप्न said...

सत्य सुबकता कोने में
झूठ दमकता पैसे में
कौन कोर्ट का निर्णय लाऊँ ?
झूठ सच का अंतर बतलाऊँ ?

SATYA KE SAATH MAZBOORI DARSHATI SARTHAK RACHNA KE LIYE BADHAAI.

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah.....वाह...

वन्दना said...

जग ये जैसे रो रहा है
मातम घर घर हो रहा है .
गीत कौन सा मैं गाऊँ ?
कैसे दुनिया को बहलाऊँ ?

inhi panktiyon mein are jahan ka dard simat aaya hai........ek bahut hi behtreen aur umda rachna.