Sunday, May 17, 2009

दशानन

क्यूँ दशानन रावण को सब कहते हैं
उसके धड़ पर दस मुख ही क्यों रहते हैं
नही समझ में हमको कभी भी आता था
न ही हमको कोई यह समझाता था

पहन मुखौटा शातिर लोग रहते हैं
चेहरे पे चेहरे लगा कर मिलते हैं
देखा, जाना, सुना, पढ़ा और समझा था
कई दफा इस बात को खुद परखा था

फिर हुआ सामना मेरा इक हैवान से
जब मैने की तुलना उसकी इनसान से
हुआ दंग मैं देख कर उसके चेहरे
एक नही था, कई-कई थे उसके चेहरे

जब मिलता था वह किसी भी शख्स से
खूब योजना बना के चलता दिमाग से
हर बार दिखाता था वह अपना नया रंग
चेहरा नया, नया रूप और नया ढ़ंग

इक-इक, दो-दो नही, कई थे उसके रंग
हर इक पर इक रंग जमाता, होता जिसके संग
जिस पर उसका जो भी इक रंग था चढ़ता
वह उसको उस रंग का था ही समझता

लेकिन जिसने भी जाना उसको करीब से
देख के होता दंग चढ़े इतने रंग तरतीब से

बात एक थी और बड़ी हैरानी की
देनी होगी दाद उसकी शैतानी की
जिस पर अपना जो भी रंग था वह जमाता
किसके संग, बात कौन सी, कौन मुखौटा

याद सभी कुछ उसको रह्ता था तरतीब से
जब जब भी मिलता था वह किसी को फिर से
करता था वह बात वही और वही मुखौटा
रहती थी उसे बात याद हो कोई मुखौटा

जिससे मिलता वह लगा कर जो चेहरा
लगता सरल इंसां को वह असली चेहरा
देख देख हैरान मैं उसके कितने चेहरे
हर चेहरे पर नये चटकते रंग भरे

फिर बात समझ में आई, यह रावण का भाई
’काली विद्या’ इसने भी है कहीं से पाई
रावण के भी तो थे दस दस चेहरे
दस मुख से था मतलब शायद दस चेहरे

दशानन का तब मैने यह मतलब जाना
दस मुँह से दस लोगों से दस बातें करना
दस चेहरों की क्षमता को रखने वाला
इसीलिए कहते रावण को दस मुख वाला

मुझको भी दिखलाया इक दिन उसने रंग
किया मौत का तांडव उसने मेरे संग
देख के उसके करतब था यमराज लजाया
मैं ही हूँ प्रह्लाद भक्त वह जान न पाया

हिरण्यकश्यप सा उसने था जाल बिछाया
तड़पा कर मुझे मारने का जतन लगाया
भूल गया वह भक्तों का रक्षक भगवान
जन्म मृत्यु पर है नही उसका विधान

अंत एक दिन उस राक्षस का होना था
तड़प तड़प कर उसको भी तो मरना था
लेकिन धरती पर उसने जो छोड़े अंश
घूम रहे हैं दुनिया में वह बन कर कंस

कैसे मिले छुटकारा इस धरती को इनसे
जिससे सच्चे लोगों का फिर जीवन हरषे

कवि कुलवंत सिंह

21 comments:

विनय said...

bahut dino se aapko paDH rahaa hoon aaj tippaNi karne ke liye himmar juTaii hai... bahut achchha likhate hain aap!

नीरज गोस्वामी said...

आपके श्री मुख से इस रचना को सुनने का जो मजा है उसे मैं उठा चूका हूँ...वो घडी फिर याद हो आयी...विलक्षण रचना...बधाई...
नीरज

Neelima said...

kulwant aapki post rupali k page par parti aarhi hu .aap bahut achcha likhte hai .......... muze hindi mai post karna nhi aata ...... thanx muze join karne ka .......baki post bhi pariye na plzzzzz aap jaise log hi hame thik se rasta dikhayege

Rachna Singh said...

bahut khub

SWAPN said...

wah kulwant ji, dashanan ka varnan bha gaya, badhai sweekaren.

Vijay Kumar Sappatti said...

khulwant ji
namaskar ,

main bahut dino se aapko padhta aa raha hoon .. aap vilakhsn pratibha ke dhani hai.. hindi sahitya me aapke yogdaan par hum sabko garv hai ..
aapki is kavita me aaj ke samajik jeevan ki sacchai hai ..
itne behatreen lekhan ke liye badhai sweekar karen..

meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad bhare comment ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html


aapka

vijay

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

अंत एक दिन उस राक्षस का होना था
तड़प तड़प कर उसको भी तो मरना था
लेकिन धरती पर उसने जो छोड़े अंश
घूम रहे हैं दुनिया में वह बन कर कंस
prbhavi abhivykti .dhnyvaad

raj said...

aapboht achha likhte hai...shabad chayan lajwaab hai...nice post..

SAHITYIKA said...

aapne jis tarah ravan ko aaj ke samaj me pradarshit kiya hai.. vakai sarahniya hai.. bahut hi badhiya kavita likhi hai..
mera blog join karne k liye dhanyawad. asha karti hoo.. aapko waha ruchipurn cheeze milegi..
keep visiting n keep commenting..

Sahityika..

श्याम सखा 'श्याम' said...

हम सबके भीतर बैठे हैं जैसे अर्जुन और रावण, ठीक वैसे ही बैठे हैं विभीषण और मधुसूदन भी,
और देकर भेजा है विवेक हमें उस परम शक्ति ने
अब यह तो हम पर टिका है कि बने क्या हम
सचेतन मन से लिखी रचना पर बधाई
श्याम सखा

Kavi Kulwant said...

आप सभी मित्रों का हार्दिक धन्यवाद

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

रचना के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.आशा है हमें और रचनायें मिलेंगी....

sandhyagupta said...

Is arthpurna rachna ke liye badhai.

परमजीत बाली said...

सुन्दर रचना है।बधाई।

Pyaasa Sajal said...

zabardast...orkut pe aapko kaafi padha hai,aaj blog pehli baar dekha....aapki main kya tareef karoon...aap to ek badi hasti ho kavita ke kshetr me :)

JHAROKHA said...

अंत एक दिन उस राक्षस का होना था
तड़प तड़प कर उसको भी तो मरना था
लेकिन धरती पर उसने जो छोड़े अंश
घूम रहे हैं दुनिया में वह बन कर कंस

कैसे मिले छुटकारा इस धरती को इनसे
जिससे सच्चे लोगों का फिर जीवन हरषे

Adarneeya Kulavant ji,
aj nai atukant kavitaon ke yug men apkee ye padyatmak rachana ..vo bhee samaj ke sath judee huyee padh kar achchha laga.

ARVI'nd said...

pahli baar aapke blog par aaya hun....aapki rachna ne man moh liya....kitna achha likhte hai aap

Dr. shyam gupta said...

कुलवन्त जी, बहुत सही रचना ,रावण के दस सिरों का यही अर्थ है,१०, कुमार्ग गामी व्यक्तित्व । बधाई।

Dr. shyam gupta said...

कुलवन्त जी, बहुत सही रचना ,रावण के दस सिरों का यही अर्थ है,१०, कुमार्ग गामी व्यक्तित्व । बधाई।

surender said...

very very nice sir...

अवनीश एस तिवारी said...

I have heard this poem from you...

It has good thoughts.

Avaneesh Tiwari