Friday, September 14, 2007

गुरू गोविंद सिंह जी - कविता

धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई,
सिख नू सच दी राह दिखलाई ।

नानक दे सिख नू चोला पहनाया,
सरबस अरपण करना सिखलाया ।
धन - धन है गूजरी मैया,
कोख जिना दे मालक पलया ।

पंज ककयां दी पहचान बनाई,
अमृत पिला जुल्मा नाल लड़न दी ताकत दिलाई।
सब तो वखरा है सिंह सजाया,
दीन दुनिया दा उसनू रक्षक बनाया।

धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई,
सिख नू जीवन दी राह दिखलाई ।

धर्म रक्षा लई सर्वस्व समर्पित कित्ता,
देश ते वंश उन्हाने अर्पित कित्ता ।
नौ वरे दी उम्र पिता दी बलि दिलाई,
विच चांदनी चौक भारत नू निजात दिलाई ।

उमर भर धर्म दी रक्षा लई लड़े,
सिखी देन उना दी, उना दी ही परवान चढ़े।
सवा लाख नाल इक लड़ाया,
तबै गोविंद सिंह नाम कहाया ।

धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई,
सिख को गुरू खुद को सिख बुलाई।

दुनिया दे इतिहास विच ऎ इको इक उदाहरण विरला,
वाह वाह गोविंद सिंह आपे गुरु चेला ।
निक्के जए ओ लाल उन्हा दे,
उफ न किती वार दिए सिंहा ते।

सरहद दी नीवां विच जिंदा चिनाया,
प्रान दित्ते पर धरम न गवाया ।
जोरावर ते फतेह नू बिसरा न सकदे,
हर सिंह दे दिल विच ओ वसदे।

धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई,
सिख नू अपना पूत बनाई ।

चमकौर दी गढ़ी विच ओ चमक दिखाई,
चाली सिंहा नाल लकां दी फौज लड़ाई ।
होए चमकौर दी जंग विच निसार,
लाल गोविंद दे बाबा अजीत ते जुझार ।

अलौकिक नूर दी चेहरे ते फिर वी बहार,
चार मुए तो क्या हुआ जीवत कई हजार।
धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई,
सानु सिख कौम विच जनम दिलाई।

धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई,
धन - धन गुरू गोविंद दी वडयाई।

9 comments:

परमजीत बाली said...

कुलवंत जी,गुरू गोविंद सिहं जी पर लिखी आप की कविता बहुत जानकारी से परिपूर्ण है।अच्छी रचना लिखी है।बधाई।

Lavanyam - Antarman said...

गुरू गोविन्द देव जी को सादर नमन --

सुन्दर स्तुति लिखी है आपने कुलवंत जी !

-- लावन्या

Kavi Kulwant said...

परमजीत जी लावण्या जी आप का बहुत बहुत शुक्रिया..आप का प्रोत्साहन ही मेरा मार्गदर्शन है, मेरा पुरुस्कार है...

sunita (shanoo) said...

ओ मित्रा किनी सोणी रचना है..और नाल ही संगीत की धुन भी वाह मज़ा आ गया...

सतनाम वाहेगुरु।

शानू

Kavi Kulwant said...

सुनीता जी आपके शब्दों ने तो कमाल कर दिया.. हलचल मचा दी..धन्यवाद..

Basant Arya said...

वाह भाई, मजा आ गया. सार्थक है रचना. ऐसे ही रचते रहे . अब अकसर आता रहून्गा

Neeraj Goswamy said...

Padh ke guruji di vaDyaii
Dil di kali kali muskaaii
Marde dum tak yaad rakhaange
Gallaan jo onaa samjhaaii

Behtareen kavita layii lakh lakh vadhaiiyan.

Neeraj

रवीन्द्र प्रभात said...

कुलवंत भाई,
अच्छा लगा आपके ब्लॉग की प्रस्तुति देखकर, गुरु के श्री चरणों में नत मस्तक नमन.सारथी में आपकी कविता पढ़ी थी, अच्छी लगी, आप ऐसे ही लिखते रहें, मैं ढूंढकर पढ़ लिया करूँगा....../

Jagdish C. said...

Dear Kavi kulwant singhji,
Guruji ka smapurna jeevan hee kurbaniyo se bharaa pada hai, aise mahaantam sant par kavita likha kar aapane to kamaal kar diyaa. I liked it too much as like the guru maharaaj Govind singhji.
Thank you very much.

JC Vyas