Wednesday, March 17, 2010

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 5

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 5

देश प्रेम का ज्वार भरा था,
रोम रोम अंगार भरा था .
मन में शोले भड़क रहे थे,
स्वतंत्रता को तड़प रहे थे .

प्रचण्ड शक्ति संचित कर भाल,
सत्ता को चुनौती विकराल .
पवन को भर कर अपनी श्वास,
पावक उगलने का विश्वास .

कड़क विहंसती विद्युत धारा,
टूट पड़ा अंबर घन सारा .
अंग अंग अभिमान तरंगें,
लहराये नगर नगर तिरंगे .

युग का गर्जन बन कर आया,
सिंधु प्रलय वह भीषण लाया .
राष्ट्र दर्प हुंकार लगाई,
ललाट लालिमा लहू सजाई .

काल कपाल कराल कामना,
सत्ता सिमटे सिंह सामना .
भीतर भभक भर भुजा भुजंग,
धधकाई धरती धड़क धड़ंग .

अंबर पर आग लगाने को,
कंपित धरती कर जाने को,
पीड़ा की आह मिटाने को,
जब्ती को तोड़ जगाने को .

झंझा झकझोर जमाने को,
लहरों पर नाव चलाने को,
तूफानों पर चढ़ जाने को,
प्रचण्ड विरोध दिखलाने को .

भीषण अंगार जलाने को,
जंजीरों को पिघलाने को,
वाणी देने मौन क्रोध को,
अपमानों के गरल घूँट को . (गरल = विष)

जुल्मों से लोहा लेने को,
सत्ता गोरी मटियाने को,
बन जुनून सर चढ़ जाने को,
भारत भर में छा जाने को .

देखो देखो वह आया है,
क्रांति भगत सिंह ले आया है .
सच्चा सपूत अब आया है,
क्षितिज शौर्य फिर फहराया है .

ध्वनित हुए फिर राग प्रभाती,
जन जन में थी आशा जागी .
सुप्त राष्ट्र में प्राण भर गये,
इंकलाब के गीत बस गये .

बन आँधी ललकार लगाई,
अंग्रेजों की नींद उड़ाई .
हर सपूत में ज्योत जलाई,
भारत माँ को आश जगाई .

बही हवा वो आँधी की जब,
धधकी ज्वाला नगर नगर तब .
चिनगारी बन तरुण हृदय हर,
क्रांति ज्योति की फैली घर घर .

मिली ज्योत से ज्योत अनेकों,
आँधी बन गई तूफाँ देखो .
गाँवों, नगरों, देहातों में,
विजय पताका सब हाथों में .

साइमन कमीशन जब आया,
विरोध सभी ने था जताया .
लाठी चार्ज जम कर कराई,
लाला जी ने जान गवाई .

ठान लिया था बदला लेना,
अधीक्षक सांडर्स को उड़ाना .
क्रांतिकारियों के संग मिलकर,
मारा उसे गोली चलाकर .

यौवन को अंगार बना कर,
मुकुट अभिमान देश सजाकर,
क्रांति में नई जान फूँक दी,
अखिल राष्ट्र टंकार छोड़ दी .

धुन के पक्के मतवाले जब,
चलते हैं तो फिर रुकते कब ?
पथ में काँटे, पग में छाले,
विजय प्राप्ति तक चलने वाले .

गठन ’नौजवान भारत सभा’,
भर राष्ट्र प्राण आलोक प्रभा .
नस नस में ज्वाला भभक रही,
ले अभय जवानी धधक रही .

विष जो सत्ता ने बोया था,
सिंह जहर उगलने आया था .
जो दारुण दर्द दबाया था,
वह दर्द मिटाने आया था .

बाँध कफन को निकला घर से,
सत्ता सहम गई थी डर से .
तैरा तूफाँ पर मरदाना,
चला सुनामी पर दीवाना.

कवि कुलवंत सिंह

2 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया रचना!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (30-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ...!